दुआए कुनूत और तर्जुमा के साथ

 दुआए कुनूत




 अल्लाहुम्मदिनी फीमन हदैत, वआफिनी फीमन आफैत व तवल्लनी फीमन तवल्लैत, वबारिक ली फीमा अस्त, वकिनी शर-र मा कज़ैत, फइन्न-क तकज़ी वायुकज़ा अलैक, वइन्नहू ला यजिल्लु मंव वालैत, तबारक – रब्बना व तआलैत. 

दुआ के खातिमह पर यह दरुद पढ़ना चाहिए :
( व सल्लल्लाहु अलन्नबिय्य )

तर्जुमा : ऐ अल्लाह ! मुझे हिदायत दे उन में जिन को तूने हिदायत दी और मुझे आफियत (चैन) दे उन में जिनको तूने आफियत दी और मुझे दोस्त बना उन में जिन को तूने दोस्त बनाया और मुझे बरकत दे उस में जो तूने मुझे दिया है और मुझे उस बुराई से बचा जिस का तूने फैसला किया है, पस बेशक तू ही फैसला करता है और तेरे ऊपर किसी का फैसला नहीं होता, बेशक वह ज़लील नहीं होता जिस को तू दोस्त रखे, तू बरकतवाला है हमारे रब और तू बुलंद ( ऊँचा, अज़ीम ) है । 
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दुआए कुनूत (Dua-e-Qunoot) एक विशेष दुआ है जो मुख्य रूप से वित्र (Witr) नमाज़ के दौरान पढ़ी जाती है, जो रात की आखिरी नमाज़ होती है। इसे आमतौर पर तीसरी रकअत में कियाम (खड़े होकर) के दौरान रुकू से पहले पढ़ा जाता है। यह दुआ अल्लाह से माफी, हिदायत, और बरकत मांगने के लिए पढ़ी जाती है। दुआए कुनूत का अरबी पाठ:

اللَّهُمَّ اهْدِنِي فِيمَنْ هَدَيْتَ، وَعَافِنِي فِيمَنْ عَافَيْتَ، وَتَوَلَّنِي فِيمَنْ تَوَلَّيْتَ، وَبَارِكْ لِي فِيمَا أَعْطَيْتَ، وَقِنِي شَرَّ مَا قَضَيْទ
وَكَفَّلْ عَنِّي شَرَّ مَا لَمْ تَقْضِ، فَإِنَّكَ أَنْتَ الْغَفُورُ الرَّحِيمُ

हिंदी अनुवाद:

ऐ अल्लाह! मुझे उन लोगों के साथ हिदायत दे जिन्हें तूने हिदायत दी, और मुझे उन लोगों के साथ आफियत दे जिन्हें तूने आफियत दी, और मेरी हिफाज़त उन लोगों के साथ कर जिनकी तू हिफाज़त करता है, और मुझे जो कुछ तूने दिया उसमें बरकत दे, और मुझे उस शर (बुराई) से बचा जो तूने मेरे लिए नहीं लिखा, क्योंकि तू बड़ा माफ करने वाला और रहम करने वाला है।
दुआए कुनूत पढ़ने का तरीका:वित्र की तीसरी रकअत में: कियाम के दौरान, सूरह पढ़ने के बाद, तक्बीर (अल्लाहु अकबर) कहकर दोनों हाथ बांध लें या ऊपर उठाएं।
दुआ को धीमे या ज़ोर से पढ़ा जा सकता है, यह मस्जिद या व्यक्तिगत प्रथा पर निर्भर करता है।
दुआ के बाद रुकू में चले जाएं।
महत्व:यह दुआ अल्लाह से मार्गदर्शन, सुरक्षा, और बरकत मांगने का एक सुंदर तरीका है।
हनफी मज़हब में इसे वित्र की नमाज़ में पढ़ना सुन्नत है, जबकि कुछ अन्य मज़हब इसे हर नमाज़ में पढ़ सकते हैं, खासकर मुश्किल वक्त में।
नोट:अगर आपको दुआ याद नहीं है, तो आप कोई और दुआ या तस्बीह पढ़ सकते हैं, जैसे "रब्बना आतिना फिद्दुनिया हसनतं..."।
अलग-अलग मज़हबों में दुआए कुनूत की प्रथा में थोड़ा अंतर हो सकता है।
अगर आपको और जानकारी चाहिए, जैसे दुआ का उच्चारण या और विवरण, तो बताएं!