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Sameem khan
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क़ुरआन अल्लाह की किताब है। वह अपनी मूल अरबी भाषा में पूर्णतः सुरक्षित है। ऐसी एक किताब का अनुवाद कभी मूल किताब का विकल्प नहीं बन सकता। क़ुरआन के अनुवाद का उद्देश्य उसको बोधगम्य बनाना है, परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि जो व्यक्ति अरबी भाषा न जानता हो, वह कुरआन को समझ नहीं सकता। क़ुरआन, अरबी भाषा न जानने वाले के लिए भी एक बोधगम्य किताब है। क़ुरआन प्रत्यक्षतः अरबी भाषा में है, परन्तु वास्तविकता यह है कि वह प्रकृति की भाषा में है, अर्थात वह भाषा जिसमें अल्लाह ने रचना के समय समस्त मनुष्यों से प्रत्यक्ष सम्बोधन किया था। यह सम्बोधन प्रत्येक महिला और पुरुष के अन्दर सहज रूप में सदैव विद्यमान रहता है। इसलिए कुरआन प्रत्येक मनुष्य के लिए एक बोधगम्य किताब है, किसी के लिए चेतन रूप से और किसी के लिए अचेतन रूप से |
इस वास्तविकता का क़ुरआन में इन शब्दों में उल्लेख है: "यह खुली हुई आयतें हैं उन लोगों के सीनों में जिनको ज्ञान प्रदान हुआ है।" ( 49:49)
इसका अर्थ यह है कि क़ुरआन जिस आसमानी वास्तविकता को चेतना की भाषा में बता रहा है, वह सहज भाषा में पहले से मनुष्य के अन्दर मौजूद है। क़ुरआन का सन्देष मनुष्य के लिए कोई अजनबी सन्देष नहीं, वह उसी ज्ञान की एक शाब्दिक अभिव्यक्ति है जिससे मनुष्य प्रकृति के स्तर पर पहले से परिचित है।
क़ुरआन में बताया गया है कि जो मनुष्य बाद के युग में पैदा हो रहे हैं, वह सब प्रारम्भिक रूप से आदम की रचना के समय ही पैदा कर दिये गये थे । उस समय अल्लाह ने उन मानव आत्माओं से प्रत्यक्ष सम्बोधन किया। इस मामले का क़ुरआन में इस तरह वरर्णन है:
" और जब तेरे पालनहार ने आदम की सन्तान की पीठों से उनकी सन्तान को निकाला और उनको साक्षी ठहराया था स्वंय उनके ऊपर, “क्या मैं तुम्हारा पालनहार नहीं हूँ" उन्होंने कहा हाँ, हम स्वीकार करते हैं। यह इसलिए हुआ कि कहीं तुम क़ियामत के दिन कहने लगो कि हमको तो इस बात की ख़बर न थी" । (7:172)
अल्लाह और बन्दे के बीच एक और वार्त्ता का उल्लेख क़ुरआन में इस प्रकार आया है:
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