Editors' Choice

क़ुरआन अल्लाह की किताब परिचय 1.4

परिचय

शैली के सम्बन्ध में यह कहना उपयुक्त होगा कि उसकी शैली एक राजसी शैली है। कुरआन को पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे उसका लेखक एक ऐसे उच्चतम स्थान पर है जहाँ से वह सम्पूर्ण मानवता को देख रहा है, सम्पूर्ण मानवता उसका कन्सर्न (concern) है, वह अपनी महानता के स्थान से सम्पूर्ण मानवता को सम्बोधित कर रहा है । यद्यपि, इस सम्बोधन के बीच वह कभी एक समूह की ओर मुड़ जाता है और कभी दूसरे समूह की ओर ।

कुरआन का एक विशेष पहलू यह है कि उसका पाठक किसी भी क्षण उसके लेखक से कन्सल्ट (consult) कर सकता है। कुरआन का लेखक अल्लाह है। वह एक जीवन्त हस्ती है। वह सम्पूर्ण मानवता को घेरे हुए है। वह किसी मध्यस्थ के बिना आदमी की बात को सुनता है और उसका उत्तर देता है । इसलिए क़ुरआन के पाठक के लिए प्रतिक्षण यह संभव है कि वह अल्लाह से सम्पर्क स्थापित कर सके। वह अल्लाह से पूछे और अल्लाह से अपने प्रश्नों का उत्तर पा ले ।

जो लोग मात्र मीडिया के माध्यम से क़ुरआन को जानते हैं, वह सामान्य रूप से समझते हैं कि क़ुरआन जिहाद की किताब है और जिहाद उनके दृष्टिकोण के अनुसार, नाम है- हिंसा के माध्यम से अपने उद्देश्य को प्राप्त करने का । परन्तु यह मात्र गलतफ़हमी (भ्रम ) है । जो व्यक्ति भी क़ुरआन को प्रत्यक्ष रूप से पढ़े, उसके लिए यह समझना मुष्किल नहीं होगा कि क़ुरआन का हिंसा से कोई सम्बन्ध नहीं । कुरआन पूर्ण रूप से शान्ति की पुस्तक है, वह हिंसा की पुस्तक नहीं ।

जिहाद क्या है ?

यह एक वास्तविकता है कि क़ुरआन की शिक्षाओं में एक शिक्षा वह है जिसको जिहाद कहा जाता है । परन्तु जिहाद शान्तिपूर्ण प्रयास का नाम है, न कि किसी तरह की हिंसात्मक कारवाई का । कुरआन में बताई गई जिहाद की धारणा क़ुरआन की इस आयत से ज्ञात होती है: “और इसके (क़ुरआन) माध्यम से तुम उनके साथ बड़ा जिहाद करो। " ( 25:52)

क़ुरआन की इस आयत में, कुरआन के माध्यम से जिहाद करने की शिक्षा दी गयी है। स्पष्ट है कि क़ुरआन कोई हथियार नहीं, क़ुरआन एक वैचारिक पुस्तक है। कुरआन, अल्लाह की आडियॉलोजी (विचारधारा) का परिचय है । इससे क़ुरआन में बताई गई जिहाद की धारणा स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। क़ुरआन के अनुसार, जिहाद वास्तव में शान्तिपूर्ण वैचारिक संघर्ष (peaceful ideological struggle) का नाम है। इस वैचारिक संघर्ष का लक्ष्य क़ुरआन में यह बताया गया है कि क़ुरआन का शान्तिपूर्ण संदेश लोगों के दिलों में उतर जाये |

इस आयत के अनुसार, कुरआन का वांछित कथन वह है जो क़ौल - ए बलीग ( बोधगम्य कथन) हो, अर्थात ऐसी वाणी जो लोगों के मन को सम्बोधित करे, जो लोगों को सन्तुष्ट करने वाली हो, जिसके माध्यम से लोगों को क़ुरआन की सच्चाई पर विश्वास पैदा हो, जिसके माध्यम से लोगों के अन्दर वैचारिक क्रान्ति उत्पन्न हो जाये। यह कुरआन का मिशन है। और इस प्रकार का वैचारिक मिशन मात्र तर्कों के माध्यम से पूरा किया जा सकता है। हिंसा अथवा किसी भी सशस्त्र कारवाई के माध्यम से इस लक्ष्य को पाना संभव नहीं ।

यह सही है कि क़ुरआन में कुछ ऐसी आयतें हैं जो क़िताल (युद्ध) की अनुमति देती हैं, परन्तु यह आयतें मात्र युद्ध स्थिति के लिए हैं, वह मात्र आक्रमण के समय बचाव के अर्थ में हैं। रक्षात्मक युद्ध के अतिरिक्त, कोई युद्ध इस्लाम में वैध नहीं। यह रक्षात्मक युद्ध भी मात्र एक स्थापित राज्य ( established (State) कर सकता है। राज्य के अतिरिक्त किसी भी व्यक्ति, अथवा संगठन को जिहाद छेड़ने की अनुमति नहीं ।

क़ुरआन को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण बात यह है कि कुरआन कोई क़ानूनी किताब नहीं है, कुरआन एक दावती ( आवाहक) किताब है। क़ुरआन की वाकू शैली क़ानूनी नहीं है, बल्कि आवाहक है। क़ानून की भाषा निर्धारण करने वाली भाषा होती है। क़ानूनी लेख में चीजें शाब्दिक रूप से वांछित होती हैं, जबकि आवाहक लेखन का मामला ऐसा नहीं । आवाहक लेख में उसके अर्थ पर विशेष ध्यान दिया जाता है। आवाहक किताब में शब्दों की हैसियत मात्र एक माध्यम की हो जाती है, जबकि क़ानूनी किताब में शब्द स्वयं अपने आप में वांछित बन जाते हैं ।
इसका एक पहलू यह है कि दावती लेख में विशेष बल देकर उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए तीव्रता की शैली को अपनाया जाता है। आवाहक लेख में ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है जो प्रत्यक्षतः अत्यन्त कठोर प्रतीत होते हैं, परन्तु आवाहक वाणी में यह कठोरता विवेक पर आधारित होती है। ऐसी किसी वाणी में कठोरता को देखकर उसको क़ानूनी कठोरता के अर्थ में लेना, पूर्णतः नासमझी की बात होगी। इसी तत्वदर्शिता का यह परिणाम है कि आवाहक भाषा

में अधिकतर ऐसा होता है कि उसमें एक ऐसी बात कही जाती है जो क़ानूनी शैली के अनुसार अत्यन्त कठोर प्रतीत होती है, परन्तु आवाहक शैली के अनुसार वह मात्र झिंझोड़ने के लिए होती है, वह मात्र इसलिए होती है कि मनुष्य की प्रकृति को जगाया जाये, उसके अन्दर छिपे हुए भावों को गतिमान किया जाये । एक उदाहरण से इसका स्पष्टीकरण होता है।

पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल.) के जीवन काल में बद्र ( 2 हिजरी) का युद्ध हुआ । यह युद्ध आक्रमण के समय आपने बचाव के लिए लड़ा था । इस युद्ध में आपको विजय प्राप्त हुई । युद्ध के बाद आपने विरोधियों के 70 व्यक्तियों को गिरफ़्तार कर लिया। इसके बाद यह लोग युद्ध बंदी की हैसियत से मदीना लाये गये। इस घटना पर क़ुरआन में यह आयत अवतरित हुई: “किसी पैग़म्बर के लिए उपयुक्त नहीं कि उसके पास क़ैदी हों, जब तक वह धरती में अच्छी तरह रक्तपात न कर ले।" ( 8:67)

इस आयत के शब्दों को यदि क़ानूनी अर्थ में लिया जाये तो इसका अर्थ यह होगा कि युद्ध बंदियों की आवश्यक रूप से हत्या की जानी चाहिए। जैसा कि ज्ञात है, यह युद्ध बंदी क़ुरआन के अवतरण के समय पूर्णतः मुहम्मद (सल्ल.) के नियंत्रण में थे। ऐसी स्थिति में यह आयत यदि क़ानून की भाषा में होती तो उसमें इस तरह के शब्द होने चाहिए थे कि जिन 70 व्यक्तियों को तुम युद्ध के मैदान से गिरफ़्तार करके मदीना लाये हो, वह सब के सब अपने अपराध के कारण गर्दन उड़ा देने योग्य हैं, इसलिए तुरन्त इनकी हत्या करके इन्हें समाप्त कर दो। परन्तु न क़ुरआन में ऐसी आयत उतरी और न रसूल (सल्ल.) ने इस आयत को क़ानूनी आयत समझकर उस पर शाब्दिक रूप से अमल किया ।

यह घटना स्पष्ट रूप से बताती है कि यह आयत अपने प्रकट अर्थों के अनुसार वांछित न थी, बल्कि वह अपनी वास्तविकता के अनुसार वांछित थी, यह भाषा की कठोरता का मामला था जो इसलिए था कि युद्ध बंदियों के अन्दर अपने सुधार की भावना उत्पन्न हो । दूसरे शब्दों में यह कि क़ुरआन की उपर्युक्त आयत में जो बात थी, वह कोई क़ानूनी आदेश न था बल्कि वह मात्र हैमरिंग की भाषा (language of hammering) थी। इस आयत का अर्थ अपराधियों का सुधार था, न कि अपराधियों की हत्या । अतः उन क़ैदियों में से अधिकतर लोग बाद में इस्लाम में प्रविष्ट हो गये। उदाहरण के रूप में सुहैल बिन अम्र आदि ।

जो लोग कुरआन के माध्यम से सच्चाई की खोज करें, उनको क़ुरआन काम करने का दो सूत्रीय कार्यक्रम देता है। अपने जीवन में अल्लाह के मार्गदर्शन का पूर्ण रूप से आज्ञापालन, और दूसरे मनुष्यों को इस आसमानी मार्गदर्शन से अवगत कराना। आसमानी मार्गदर्शन के आज्ञापालन का प्रारम्भ, बोध अथवा आसमानी वास्तविकता की खोज से होता है। एक व्यक्ति जब क़ुरआन के माध्यम से सच्चाई की खोज करता है तो उसके अन्दर एक मानसिक क्रान्ति पैदा होती है । उसकी सोच बदल जाती है। उसके चाहने और न चाहने के मानक बदल जाते हैं । उसका जीवन अन्दर से बाहर तक एक नये दिव्य नक्शे में ढल जाता है ।

अल्लाह के बोध की यह अभिव्यक्ति जिन रूपों में होती है, उसको ज़िक्र ( गुणगान) और इबादत (उपासना) और उत्तम व्यवहार और ईश परायण जीवन जैसे शब्दों में प्रस्तुत किया गया है। सच्चाई की खोज कोई मेकेनिकल खोज नहीं है। सच्चाई की खोज जीवन की वास्तविक्ता की खोज हैं, और जिस व्यक्ति को जीवन की वास्तविकता का बोध हो जाये, वह स्वयं अपनी प्रकृति के बल पर एक नया मनुष्य बन जाता है। सच्चाई की खोज किसी मनुष्य के लिए एक जन्म के बाद दूसरा जन्म लेना है। यह नया जन्म एक ऐसे विकासशील वृक्ष जैसा है जो सदैव बढ़ता रहे, जिसके विकास की यात्रा कभी समाप्त न हो ।

कुरआन के माध्यम से जो लोग सच्चाई की खोज करें, उनके व्यवहारिक कार्यक्रम का दूसरा भाग वह है जिसको क़ुरआन में अल्लाह की ओर आवाहन कहा गया है, अर्थात आसमानी सच्चाई से दूसरों को अवगत कराना। यह आवाहन प्रक्रिया एक अत्यन्त गम्भीर प्रक्रिया है । यह पूर्ण डेडीकेशन (dedication) चाहता है। इसी पहलू से इसको जिहाद भी कहा गया है।

क़ुरआन के अनुसार, जिहाद पूर्ण रूप से एक अराजनैतिक (non political ) प्रक्रिया है। आवाहक जिहाद का लक्ष्य मनुष्य के दिल को और उसके मन को बदलना है। और दिल व मन में परिवर्तन मात्र शान्तिपूर्ण प्रचार के माध्यम से होता है, न कि किसी तरह के बलात् अथवा हिंसात्मक कार्य के माध्यम से ।
क़ुरआन का वांछित मनुष्य दिव्य मनुष्य ( 3:79) है, अर्थात वह मनुष्य जो इस संसार में ख़ुदा वाला मनुष्य बने, जो पालनहार की ओर एकाग्र रहकर जीवन

व्यतीत करे। पालनहार का पसन्दीदा मनुष्य बनने की इसी प्रक्रिया को कुरआन में तकियः (शुद्धिकरण) (2:129) कहा गया है। कुरआन के अनुसार, जन्नत उन्हीं व्यक्तियों के लिए है जो इस संसार में अपना शुद्धिकरण करें, जो मुज़क्का (शुद्ध) मनुष्य बनकर अगले जीवन में प्रवेश हों। (ता.हा.: 76 )

तयिः का अर्थ है: शुद्धिकरण ( purification), अर्थात अपने व्यक्तित्व को अवांछित चीज़ों से बचाना । व्यक्तित्व को पवित्र करने की यह प्रक्रिया एक सतत् प्रक्रिया है, वह कभी समाप्त नहीं होती । क़ुरआन के मानने वाले (आस्थावान ) के अन्दर यह प्रक्रिया उसके जीवन के अन्तिम क्षण तक जारी रहती है ।

वास्तविकता यह है कि प्रत्येक मनुष्य अपने जन्म के अनुसार, मूल प्रकृति पर पैदा होता है। जन्म के अनुसार, प्रत्येक मनुष्य मिस्टर नेचर ( Mr. Nature) होता है, परन्तु जीवन में प्रतिदिन ऐसे अनुभव सामने आते हैं जो उसके प्राकृतिक व्यक्तित्व पर नकारात्मक धब्बे डालते रहते हैं, क्रोध और द्वेष और ईर्ष्या और लालच और भेदभाव और घमण्ड और अस्वीकारोक्ति और बदले की भावना, यह सब वही नकारात्मक धब्बे हैं, जो मनुष्य के प्राकृतिक व्यक्तित्व को दूषित करते रहते हैं। ऐसी स्थिति में प्रत्येक स्त्री और पुरुष को यह करना है कि वह आत्मनिरीक्षण (introspection) के माध्यम से अपना शुद्धिकरण करता रहे, वह अपने मन में पाये जाने वाले दूषित व्यक्तित्व को प्राकृतिक व्यक्तित्व बनाता रहे । प्रत्येक व्यक्ति का वातावरण उसको एक कंडीशन्ड ( conditioned) मनुष्य बना देता है। अब प्रत्येक व्यक्ति को यह करना है वह डी- कंडीशनिंग (de-conditioning) के माध्यम से अपने आप को पुनः मिस्टर नेचर बनाये । इसी मिस्टर नेचर का क़ुरआनी नाम दिव्य व्यक्तित्व अथवा अल्लाह का पसन्दीदा इन्सान है।

Comments