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Sameem khan
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परिचय
उनको विभिन्न नगरों में भेज दिया गया। यह प्रतियाँ नगर की जामा मस्जिदों में उपलब्ध रहती थीं। लोग उनको पढ़ते भी थे और उनसे अतिरिक्त प्रतियाँ तैयार करते थे।
कुरआन के लिखने का यह अनुक्रम 19वीं शताब्दी तक जारी रहा। 19वीं शताब्दी में प्रिंटिंग प्रेस का अविष्कार हुआ और साथ ही कागज़ भी आधुनिक औद्योगिक ढंग से अधिक मात्र में तैयार किया जाने लगा। इस प्रकार 19वीं शताब्दी में नियमित रूप से प्रिंटिंग प्रेस के द्वारा छपाई का आरम्भ हो गया। छपाई की विधियों में निरन्तर विकास होता रहा। इसी के साथ क़ुरआन की मुद्रित प्रतियाँ भी अधिक उत्कृष्ट रूप में तैयार होने लगीं। अब क़ुरआन की मुद्रित प्रतियाँ इतनी सामान्य हो गयी हैं कि वह प्रत्येक घर में और प्रत्येक मस्जिद में और प्रत्येक पुस्तकालय में और प्रत्येक बाजार में इस प्रकार प्रचूर संख्या में उपलब्ध हैं कि प्रत्येक मनुष्य विभिन्न भाषा में क़ुरआन की छपी हुए सुन्दर प्रतियाँ प्राप्त कर सकता है, चाहे वह पृथ्वी के किसी भी भाग में हो ।
अल्लाह की सृष्टि निर्माण योजना प्रत्येक किताब का एक विषय (subject) होता है। कुरआन का विषय यह है कि अल्लाह की सृश्श्टि निर्माण योजना (Creation Plan of God) से मनुष्य को अवगत कराया जाये, अर्थात मनुष्य को यह बताया जाये कि अल्लाह ने यह संसार किस लिए बनाया है । मनुष्य को धरती पर बसाने का उद्देश्य क्या है । मृत्यु से पहले के जीवन काल में मनुष्य से क्या वांछित हैं, और मृत्यु के बाद के जीवनकाल में मनुष्य के साथ क्या घटित होने वाला है। मनुष्य एक अमर रचना है। उसकी जीवन यात्रा मृत्यु के बाद भी जारी रहती है। कुरआन इस सम्पूर्ण जीवन यात्रा के लिए एक मार्गदर्शक किताब की हैसियत रखता है । मनुष्य को इस वास्तविकता से अवगत करना, यही क़ुरआन का उद्देश्य है और यही कुरआन की वार्त्ता का विषय है।
अल्लाह ने मनुष्य को एक अमर रचना की हैसियत से पैदा किया। फिर उसके जीवन काल को दो भागों में बाँट दिया। उसका बहुत थोड़ा भाग मृत्यु से पहले के समय में रखा और उसका अधिक बड़ा भाग मृत्यु के बाद के जीवन काल में रख दिया। मृत्यु से पहले का जो काल है, वह परीक्षा काल है और मृत्यु के बाद का जो काल है वह परीक्षाफल के अनुसार, अच्छा या बुरा परिणाम
परिचय
पाने का काल । क़ुरआन, जीवन की इसी वास्तविकता के लिए एक परिचयात्मक पुस्तक की हैसियत रखता है।
क़ुरआन एक दृष्टि से उपकार करने वाले की ओर से पुरस्कार का अनुस्मरण है। अल्लाह ने मनुष्य को विशेष गुणों के साथ पैदा किया। फिर उसको पृथ्वी जैसे ग्रह पर बसाया, जहाँ मनुष्य के लिए प्रत्येक क़िस्म का लाईफ सपोर्ट सिस्टम (Life Support System) उपलब्ध है। कुरआन का उद्देश्य यह है कि मनुष्य, प्रकृति के इन पुरस्कारों से लाभान्वित होते हुए उपकार करने वाले को याद रखे। वह पुरस्कारों के रचयिता पर आस्था रखे । पुरस्कारों का उपभोग करते हुए उपकारक को मानना और उसके तगादों को पूरा करना, यही सदैव रहने वाली जन्नत का सर्टिफिकेट (certificate) है। और पुरस्कारों का उपभोग करते हुए उपकारक को भूल जाना, मनुष्य को नरक ( जहन्नम ) का भागी बना देता है। कुरआन वास्तव में इसी सबसे बड़ी वास्तविकता का अनुस्मरण है ।
आप क़ुरआन को पढ़ें तो आप उसमें बार बार इस तरह के वर्णन पायेंगे कि यह अल्लाह की उतारी हुई वाणी (Word of God) है। प्रत्यक्ष रूप से यह एक साधारण सी बात है, परन्तु जब इसको तुलनात्मक रूप से देखा जाये तो पता चलेगा कि यह अत्यन्त असाधारण बात है । संसार में बहुत सी किताबें हैं जिनके सम्बन्ध में लोगों का विश्वास है कि वह आसमानी किताबें हैं । परन्तु क़ुरआन के अतिरिक्त किसी भी पवित्र धर्म ग्रन्थ में आपको यह लिखा हुआ नहीं मिलेगा कि यह अल्लाह की वाणी है। इस तरह का वर्णन विशेष रूप से मात्र कुरआन में पाया जाता है। कुरआन में इस तरह वर्णन का होना, उसके पाठक को एक प्रारंभिक बिन्दु ( Starting Point) देता है । वह क़ुरआन का अध्ययन एक विशेष प्रकार की पुस्तक के रूप में करता है, न कि साधारण मानवीय पुस्तक के रूप में ।
क़ुरआन की शैली भी एक अनोखी शैली है । साधारण मानवकृत पुस्तकों का तरीका यह है कि उसमें चीज़े एक लेखन क्रम के साथ लिखी होती हैं। उसमें A से Z तक क्रमबद्ध रूप से चीज़ों का वर्णन किया जाता है । परन्तु कुरआन में इस प्रकार की शैली मौजूद नहीं । साधारण मनुष्य को प्रत्यक्षतः क़ुरआन एक अक्रमबद्ध वाणी प्रतीत होती है, परन्तु वास्तविकता के अनुसार देखा जाये तो वह एक अत्यन्त व्यवस्थित और क्रमबद्ध वाणी दिखायी देगा। क़ुरआन की वाकू
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