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क़ुरआन अल्लाह की किताब परिचय 1.2

परिचय

23 वर्ष की अवधि में भिन्न भिन्न अंशों के रूप में उतारा गया। इस्लाम के

पैग़म्बर मक्का में थे, जबकि 610 ई. में कुरआन का पहला भाग उतरा। उसके

बाद निरन्तर उसके विभिन्न भाग आप पर उतरते रहे। कुरआन का अन्तिम

भाग आप पर 632 ई. में उतरा, जबकि आप मदीने में थे। कुरआन का यह

अवतरण फ़रिश्ता जिब्रील के माध्यम से होता था । अन्त में स्वयं फ़रिश्ता जिब्रील

के निर्देशा अनुसार, क़ुरआन के विभिन्न अंशों को एक ग्रन्थ के रूप में संकलित

किया गया।

क़ुरआन में कुल 114 सूरतें हैं, कुछ बड़ी सूरतें हैं और कुछ छोटी सूरतें । आयतों की संख्या कुल 6236 है। तिलावत (वाचन) की सुविधा के लिए क़ुरआन को तीस भाग और सात मंज़िल के रूप में बाँटा गया है। कुरआन सातवीं शताब्दी की प्रथम चौथाई में उतरा। उस समय काग़ज़ अस्तित्व में आ चुका था । यह काग़ज़ कुछ विशेष वृक्षों के रेशे से लेकर हस्त उद्योग के रूप में बनाया जाता था। उसको पपायरस (Papyrus) कहा जाता है। क़ुरआन का कोई अंश जब भी उतरता तो उसको उस कागज़ पर लिख लिया जाता था, जिसको अरबी भाषा में 'क़िरतास' कहा जाता है। इसी के साथ लोग कुरजान को अपनी स्मृति में सुरिक्षत कर लेते थे, क्योंकि उस समय क़ुरआन ही एक मात्र इस्लामी साहित्य था। कुरआन को नमाज़ों में पढ़ा जाता था और इस्लाम की ओर आमन्त्रित करने के लिए उसको लोगों के समक्ष पढ़कर सुनाया जाता था। इस प्रकार कुरआन एक ही साथ लिखा भी जाता रहा और इसी के साथ उसको कण्ठस्थ भी किया जाता रहा ।

इस्लाम के पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल.) के अन्तिम जीवन काल तक क़ुरआन को सुरक्षित करने का यही तरीक़ा प्रचलित रहा। आपकी मृत्यु 632 ई. में हुई, इसके बाद अबू बक्र सिद्दीक (रज़ि.) इस्लाम के पहले ख़लीफ़ा बने। उन्होंने नियमित रूप से अपनी देख रेख में क़ुरआन की एक जिल्द चढ़ाई हुई संकलित प्रति बनाई । यह प्रति प्राचीन काल के काग़ज़ अथवा क़िरतास पर बनायी गयी थी । कुरआन की इस प्रति की जिल्द का साइज़ चौकोर था, अतः उसको रबआ (वर्ग) कहा जाता था । इस प्रकार कुरआन, पहले ख़लीफ़ा के युग में एक जिल्द चढ़ी हुई किताब के रूप में सुरक्षित हो गया। तीसरे खलीफा उस्मान बिन अफ्फान के युग में इस जिल्द वाले कुरआन की अतिरिक्त प्रतियाँ तैयार की गयीं और

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