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क़ुरआन अल्लाह की किताब परिचय 1.1

 परिचय

“हमने अमानत (ऐच्छिक कर्म) को आसमानों और धरती और पहाड़ों के समक्ष प्रस्तुत किया तो उन्होंने उसको उठाने से मना किया और वह इससे डर गये और मनुष्य ने इसको अर्थात अमानत को उठा लिया । निस्सन्देह, वह अत्याचारी और अज्ञानी था।" (33:72)

इन दोनों आयतों से पता चलता है कि रचना के प्रारम्भ में अल्लाह ने सभी मनुष्यों को प्रत्यक्ष रूप से सम्बोधित किया था। इस सम्बोधन में जो बात कही गयी थी, वह समस्त मनुष्यों के अवचेतन में सुरक्षित कर दी गयी । मानो अल्लाह की जिस वाण मनुष्य, कुरआन के रूप में पढ़ रहा है, इससे पहले प्रत्यक्षतः अल्लाह के सम्बोधन के अन्तर्गत वह उस वाणी को सुन चुका है और समझ चुका है। क़ुरआन, मनुष्य के लिए एक जानी हुई बात को जानना है, न कि किसी अनजानी बात को अचानक सुनना । वास्तविकता यह है कि क़ुरआन इन्सान की चेतना का प्रकटन (unfolding ) है ।

इस बात को सामने रखा जाये तो यह जानना कठिन नहीं कि क़ुरआन को समझने के लिए क़ुरआन का अनुवाद भी एक पर्याप्त साधन की हैसियत रखता है। जिस व्यक्ति की प्रकृत्ति जीवित हो, जिसने अपने आप को बाद की कंडीशनिंग (conditioning) बचाया हो, वह जब क़ुरआन का अनुवाद पढ़ेगा तो उसके मन के वह खाने खुल जायेंगे जहाँ संरचना के समय किया गया अल्लाह का सम्बोधन पहले से सुरक्षित है। "अलस्तु बिरब्बिकुम" (क्या मैं तुम्हारा पालनहार नहीं हूँ) की प्रतीज्ञा यदि यह अल्लाह का पहला सम्बोधन है तो क़ुरआन अल्लाह का दूसरा सम्बोधन है। दोनों एक दूसरे के लिए पुष्टि की हैसियत रखते हैं। कोई व्यक्ति यदि अरबी भाषा न जानता हो, अथवा कम जानता हो और वह मात्र क़ुरआन का अनुवाद पढ़ने की स्थिति में हो तो उसको क़ुरआन बोध के सम्बन्ध में निराशा का शिकार नहीं होना चाहिए- क़ुरआन की यह मानव शरणा वर्तमान युग में एक वैज्ञानिक तथ्य बन चुकी है। वर्तमान युग में जेनेटिक (आनुवशिंक) कोड का विज्ञान और एन्थ्रोपोलोजी (मानव विज्ञान) का अध्ययन, दोनों कुरआन के इस दृष्टिकोण की पूर्णतः पुष्टि करते हैं ।

क़ुरआन अल्लाह की किताब

क़ुरआन अल्लाह की किताब हैं, जो इस्लाम के पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल.) को प्रदान की गयी । कुरआन एक संकलन के रूप में नहीं उतरा है, बल्कि वह

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