जब खाक में छुपा चुकी बेटी रसूल की मुंह रख के अपना क़ब्र पे रोते रहे अली कुरान पढ़ रहे थे जो रो रो के मुर्तजा इतने में आई फातिमा ज़हरा की ये सदा मरकद पे मेरी ऐसी ना आंसू बहाए अब रात हो चुकी है बहुत लौट जाइए मालूम है ये आपके नाज़ों के हैं पीले बच्चे कभी भी रात में तन्हा नहीं रहे घर जाके प्यार किये खाना खिलाइये...
अब रात हो चुकी है बहुत... बिछड़े हैं पहली बार जो मदार से नौ नेहाल बच्चों का मेरे या अली रखना बहुत ख्याल लिपटा के अपने सीने से धरस बंधाइए...
अब रात हो चुकी है...
मिलता नहीं है चेन मेरे दिल के चेन को रातों में प्यास लगती है मेरे हुसैन को अश्कों को उसके पोंचिए पानी पिलाइए...
अब रात हो चुकी है...
जैनब बहुत है छोटी ये गम सह ना पाएगी कहना भी जो चाहेगी तो कुछ कह न पाएगी बिन माँ के कैसे रहते हैं उसको सिखाएँ...
अब रात हो चुकी है...
एक आरज़ू है अपने मरकद पे या अली ले आओ गा बच्चों को मेरे कभी कभी मेरा निशान ए क़ब्र कई जा बनाई... अब रात हो चुकी है...
फरियाद का ना क़ब्र पे रोने का वक़्त है बच्चों का मेरे या अली सोने का वक़्त है लोरी थपका के दीजिए उनको सुलाईए... अब रात हो चुकी है...
मुझको यकीन है आज वो हरगिज़ ना सोएंगे छुप छुप के मेरे हजरे में जा कर वो रोएंगे मेरी निशानियों को वहां से हटाइए...
अब रात हो चुकी है... ऐनी भला वो किस तरह बेचर्गी लिखे अमीर ना जाने कैसे अली क़ब्र से उठे आवाज़ बस ये आती रही ग़म ना खाइए... अब रात हो चुकी है...
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