तन्हाई में रहने वाले बुजुर्ग

तन्हाई में रहने वाले बुजुर्ग


अजीम ताबेई, बुजुर्ग हज़रत इयास बिन क्रितादा, भगवान उन पर दया कर सकते हैं, अपने लोगों के नेता थे। एक दिन उसने दर्पण में अपनी दाढ़ी में सफेद बाल देखे और प्रार्थना की "या अल्लाह पाक! मैं अचानक हदीस से आपकी शरण चाहता हूं, मुझे पता है कि मौत मेरा पीछा कर रही है और मैं इससे बच नहीं सकता।" फिर वह अपनी क़ौम के पास तशरीफ़ ले गया और कहने लगा: "ऐ बनू साद! मैंने अपनी जवानी तुम्हें समर्पित कर दी है, अब तुम मेरी बुढ़ापे को माफ कर दो (अर्थात जवानी में मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म किए थे)। लेकिन मुझे जाने दो बुढ़ापे में अल्लाह की इबादत करो।" फिर आप रहिमहुल्लाह अपने घर तशरीफ लाये और इबादत में मशगूल हो गये यहां तक कि आपकी मौत सम्मानजनक हो गयी। (112) बजर अल-नामू, स) अल्लाह उन पर दया करे और हम उनके लिए आभारी रहें

किसी शाइर ने क्या खूब कहा है :

गोशो पा दौशो ख़िरद होश में है करना है जो कर ले आज ही

चन्द सबक़ आमोज़ अरबी अश्आर का तरजमा सुनिये ! ﴾1﴿ ऐ बूढ़े शख़्स ! क्या बुढ़ापा आने के बा वुजूद भी तू जहालत (या'नी मौत को भुला कर धोके) में मुब्तला है ? अब (इस उम्र) में तेरी तरफ से जहालत का मुज़ाहरा बिल्कुल अच्छा नहीं ।

(2) तेरा फैसला तो सर के बालों की सफेदी ने कर दिया मगर फिर भी तू दुन्या की तरफ़ माइल होता है और ना पाएदार (दुन्या) तुझे धोका दे रही है।

(3) फ़ना हो जाने वाली दुन्या पर अफ्सोस करना छोड़ दे, क्यूं कि एक दिन तू भी मरने वाला है और ऐसे पक्के इरादे के साथ आगे बढ़ (या'नी इबादत कर) जिस में किसी बेहूदा पन की मिलावट न हो।

(4) मैं ने खुद को इबादत से रोक कर हलाकत इख़्तियार की है और अपनी पीठ को भारी गुनाहों से बोझल कर लिया है और ना फ़रमानी कर के गोया मैं ने अपने रब को चेलेन्ज कर दिया जब कि वोह इन्आमो एहसान व जूदो करम वाला है। मैं उस की पकड़ से डरने के साथ साथ उस के अफ़्वो दर गुज़र की उम्मीद भी रखता हूं और मैं इस बात का पक्का यकीन रखता हूं कि वोह ही इन्साफ़ फ़रमाने वाला हाकिमे मुत्लक है।

उम्र बदियों में सारी गुज़ारी बख़्श महबूब का वासिता है विर्दे लब कलिमए तय्यिबा हो आ गया हाए ! वक़्ते क़ज़ा है हाए ! फिर भी नहीं शर्मसारी या खुदा तुझ से मेरी दुआ है और ईमान पर खातिमा हो या खुदा तुझ से मेरी दुआ है

(आँसुओं का सागर, पृष्ठ 113)

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