नमाज़े इशा से पहले सोना

नमाज़े इशा से पहले सोना


हुज़ूरे अकरम फ़रमाते हैं : जो नमाज़े इशा से पहले सोए अल्लाह पाक उस की आंख को न सुलाए। अमीरुल मुअमिनीन हज़रते उमर फारूके आज़म ने अपने हुक्काम को एक फ़रमान लिखा जिस में येह भी है कि जो इशा से पहले सो जाए खुदा करे उस की आंखें न सोएं, जो सो जाए उस की आंखें न सोएं, जो सो जाए उस की आंखें न सोएं। 

सय्यिदुना फ़ारूके आज़म के फ़रमान के मुतअल्लिक मुफ्ती अहमद यार खान लिखते हैं : जनाबे फ़ारूके आज़म की येह दुआए ज़रर इज्हारे ग़ज़ब (या'नी नाराज़ी ज़ाहिर करने) के लिये है। ख्याल रहे कि नमाज़े इशा से पहले सो जाना और इशा के बाद बिला ज़रूरत जागते रहना ( येह दोनों ही काम) सुन्नत के ख़िलाफ़ और नबी Sasalsase as को ना पसन्द है लेकिन नमाज़ से पहले सो कर नमाज़ ही न पढ़ना और ऐसे ही इशा के बाद जाग कर फज्र क़ज़ा कर देना हराम है क्यूं कि हराम का ज़रीआ भी हराम होता है। 

इशा से क़ब्ल सोना मक्रूह है


" बहारे शरीअत " में है : दिन के इब्तिदाई हिस्से में सोना या मग़रिब व इशा के दरमियान में सोना मक्रूह है। (बहारे शरीअत, 3/436, हिस्सा : 16 )

इशा के बाद गुफ़्तगू करने की तीन सूरतें


(1) इल्मी गुफ़्तगू, किसी से मस्अला पूछना या उस का जवाब देना या उस की तहक़ीक़ व तफ्तीश करना इस किस्म की गुफ्तगू सोने से अफ़्ज़ल है 

(2) झूटे क़िस्से कहानी कहना मस्खरा पन और हंसी मज़ाक़ की बातें करना येह मक्रूह है

(3) मुवानसत की बातचीत करना जैसे मियां बीवी में या मेहमान से उस के उन्स के लिये कलाम करना येह जाइज़ है इस किस्म की बातें करे तो आखिर में ज़िक्रे इलाही में मश्गुल हो जाए और तस्बीह इस्तिफ़ार पर कलाम का ख़ातिमा होना चाहिये।

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