- Get link
- X
- Other Apps
Editors' Choice
Posted by
Sameem khan
on
- Get link
- X
- Other Apps
करबला वालों के गम से मुतअल्लिक एक अहम फ़तवा "फ़्तावा रज़विय्या" से एक सुवाल मअ जवाब का खुलासा
सुवाल : अहले सुन्नत व जमाअत को अशरए मुहर्रमुल हराम में रन्जो ग़म है करना जाइज़ है या नहीं ?
जवाब : कौन सा सुन्नी होगा जिसे वाकिअए हाइलए करबला (यानी करबला के खौफनाक किस्से) का गम नहीं या उस की याद से उस का दिल महजून (यानी रन्जीदा) और आंख पुरनम (यानी अश्कबार) नहीं, हां मसाइब (या'नी मुसीबतों) में हम को सब का हुक्म फ़रमाया है, जज्अ फ़ज़अ (यानी रोने पीटने ) को शरीअत मन्अ फरमाती है, और जिसे वाकेई दिल में गुम न हो उसे झूटा इज्हारे गुम रिया है और कस्दन गुम आवरी व गुम परवरी (या'नी जान बूझ कर गम की कैफ़िय्यत पैदा करना और गुम पाले रहना) खिलाफे रिज़ा है जिसे इस का गुम न हो उसे बे गुम न रहना चाहिये बल्कि इस गम न होने का गम चाहिये कि उस की महब्बत नाकिस है और जिस की महब्बत नाकिस उस का ईमान नासि । (फ़्तावा रजविय्या, 24/486, 488 मुलख्खुसन)
आला हज़रत इमाम अहमद रजा खान फ़रमाते हैं : (ज़िक्रे शहादत में) न ऐसी बातें कही जाएं जिस में उन की बेकद्री या तौहीन निकलती हो । (फ़्तावा रजविय्या 23 /738)
मुकाशफ़ल कुलूब में है : जान लीजिये कि आशूरा के दिन हज़रते इमामे हुसैन के साथ जो कुछ हुवा वोह अल्लाह पाक की बारगाह में आप के दरजात और रिफ़अ़त में इजाफे की वाज़ेह दलील है लिहाजा जो शख्स इस दिन आप के मसाइब का ज़िक्र करे उसे येह मुनासिब नहीं कि सिवाए "إِنَّا ِلِلَّٰهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ" के और कुछ कहे क्यूं कि इसी में अल्लाह पाक का हुक्म मानना और फ़रमाने इलाही पर अमल करना है, जैसा कि इर्शाद होता है : ५०० (157:22) तरजमए कन्जुल ईमान : येह लोग हैं जिन पर उन के रब की दुरूदें हैं और रहमत और येही लोग राह पर हैं।
आला हज़रत इमामे अहले सुन्नत, इमाम अहमद रज़ा खान शाने सहाबा व अहले बैत बयान करते हुए लिखते हैं.
Comments
Post a Comment