करबला का खूनीं मन्ज़र रिसाले की मदनी बहार - इमामे हुसैन के वाकिआत

इमामे हुसैन के वाकिआत

करबला का खूनीं मन्ज़र रिसाले की मदनी बहार


 फैज़ाने इमामे हुसैन पाने और अख़्लाको किरदार को
निखारने के लिये आशिकाने सहाबा व अहले बैत की दीनी तहरीक दावते इस्लामी के प्यारे प्यारे दीनी माहोल से वाबस्ता हो जाइये, आप के दिलों में सहाबा व अहले बैत की महब्बत बढ़ाने के लिये एक मदनी बहार पेश करता हूं :

एक इस्लामी भाई के बयान का खुलासा है कि ग़ालिबन 2004 ई. की बात है फ़ैज़ाने मदीना में एक ज़िम्मादार मुबल्लिग (जो दावते इस्लामी के दीनी माहोल से कमो बेश 15 साल से वाबस्ता हैं) ने हैरत अंगेज़ बात बताई। उन्हों ने बताया कि उन का खानदान बद मज़हबों से तअल्लुक रखता था। बचपन ही से उन्हें येह ज़ेहन दिया गया कि आशिकाने रसूल उलमाए किराम और किसी दीनदार शख्स के क़रीब भी मत जाना वरना (13) वोह तुम्हें गुमराह कर देंगे। हुत्ता कि वोह किसी आशिके रसूल सुन्नी को मज़हबी हुल्ये में देखते तो (a) उन पर आवाज़े कसते और उन का मज़ाक उड़ाते । वोह फ़िल्मों के बड़े शौकीन थे। छुट्टी के दिन दोस्तों के साथ सिनेमा घर जा कर फ़िल्म देखने का अर्सए दराज़ से मामूल था। ज़िन्दगी इसी तरह गफलत में गुज़र रही थी कि उन के नसीब जाग उठे। 1994 ई. की बात है जब वोह कॉलेज में पढ़ते थे कि उन के मामूं जो बद अक़ीदगी से तौबा कर के आशिकाने सहाबा व अहले बैत की दीनी तहरीक दा 'वते इस्लामी के दीनी माहोल में आ कर अमीरे अहले सुन्नत के जरी सिल्सिलए आलिया कादिरिय्या रजविय्या में दाखिल हो कर "अत्तारी " बन चुके थे और सारा दिन इमामे शरीफ़ का ताज सजाए रखते थे । गालिबन शा' बानुल मुअज्जम का महीना था कि एक बार जुमुअतुल मुबारक के दिन सुबह के वक्त उनके येह मामूं उन के घर आए और जाते हुए उन मुबल्लिग् इस्लामी भाई को शहीदाने करबला से मुतअल्लि अमीरे अहले सुन्नत का रिसाला तोहफ़े में दिया। उन्हों ने येह सोच कर ले लिया कि इन के जाने के बाद कहीं रख दूंगा। मगर बाद में जब टाइटल पर रिसाले का नाम "करबला का ख़ूनीं मन्ज़र" देखा तो अपनाइयत सी महसूस हुई। चुनान्चे उन्हों ने रिसाला पढ़ना शुरू कर दिया । अहले बैते किराम से बेहद अकीदत का इज़हार इतने बा अदब अन्दाज़ में पहली बार पढ़ा । अन्दाज़े तहरीर इतना पुरसोज़ व पुर तासीर था कि उन पर रिक्त तारी हो गई और वोह करबला वालों पर होने वाले मज़ालिम को याद कर के रोने लगे । वाकिअए करबला के ज़िम्न में अमीरे अहले सुन्नत ने जिन इस्लाही मदनी फूलों से नवाजा था उन्हों ने तो उन के ज़मीर को झंझोड़ कर रख दिया। शुहदाए करबला से मुतअल्लिक बयानात तो बारहा सुने और पढ़े थे मगर "दर्से करबला " आज पहली बार समझ में आया था। उनकी अजीब कैफ़िय्यत हो रही थी। उन्हों ने अपनी बहन को क़रीब बुलाया और उसे भी वोह रिसाला पढ़ कर सुनाने लगे । रिसाला सुन कर वोह भी रोने लगीं यहां तक कि उन की हिचकियां बंध गई। अज़ीम आशिके सहाबा व अहले बैत, अमीरे अहले सुन्नत की तहरीर से हाथों हाथ बरकत जाहिर हुई और उन्हों ने और उन की बहन ने उसी वक़्त (बुरे अकाइद व आ'माल से) तौबा की और नमाज़ पढ़ने की निय्यत कर ली। शाम को जब उन के दोस्त हस्बे मा' मूल सिनेमा जाने के लिये बुलाने आए तो उन्हों ने मा'ज़िरत कर ली, उन के दोस्त हैरान थे मगर उन्होंने ज़ियादा गुफ्तगू नहीं की ।

चन्द दिनों के बाद उन्हों ने वोही रिसाला अपने अब्बू, अम्मी को भी सुनाया तो वोह भी बेहद मुतअस्सिर हुए और आपस में मश्वरा कर के आयिन्दा घर में T.V. न चलाने का पक्का ज़ेह्न बना लिया ।

(उस वक़्त तक इस्लामी चेनल नहीं शुरू हुवा था) जब जुमेरात का दिन आया तो उन्हों ने घर वालों से कहा कि मैं दावते इस्लामी के हफ्तावार सुन्नतों भरे इज्तिमान में जाना चाहता हूं । येह सुन कर अम्मी ने जो कि अमीरे अहले सुन्नत का रिसाला पढ़ कर मुतअस्सिर तो हुई थीं मगर इज्तिमान में जाने की इजाज़त देने से येह कहते हुए इन्कार कर दिया कि सिर्फ नमाज़ पढ़ो येही काफी है, इज्तिमान वग़ैरा में जाने की कोई ज़रूरत नहीं है। उन्हों ने चन्द बार अर्ज किया तो अब्बूजान ने अम्मी से फ़रमाया : अरे जाने दो, इन के मामूं भी कहते रहते हैं, वोह भी खुश हो जाएंगे। इस्लामी भाई ने मौकुअ गनीमत जानते हुए अब्बूजान को भी अपने साथ इज्तिमा में चलने की दावत पेश कर दी कि अब्बू आप भी चलें। बहन भी साथ देने लगीं, अब्बू कुछ तरद्दुद के बाद बिल आखिर चलने के लिये तय्यार हो गए।

! पहले ही हफ्तावार सुन्नतों भरे इज्तिमान में शिर्कत की बरकत से उन की ज़िन्दगी में मदनी इन्किलाब आ गया । इज्तिमाअ में जन्नत के मौजूअ पर बयान हुवा, अब्बूजान के दिल में भी दावते इस्लामी की महब्बत पैदा हुई । घर में अमीरे अहले सुन्नत के रसाइल पढ़े जाने के साथ साथ "सुन्नतों भरे बयानात " सुने जाने लगे।

इस की बरकत से न सिर्फ उन का पूरा घर बल्कि खानदान के चन्द दीगर घराने भी बद महबिय्यत से तौबा कर के दावते इस्लामी के दीनी माहोल से वाबस्ता हो गए। हैरत की बात यह है कि उन के 'खानदान में बुरक पहनने का बिल्कुल रवाज न था और बद किस्मती से बुरक पहनने को बहुत ज़ियादा मा' यूब समझा जाता था। अज़ीम आशिके सहाबा व अहले बैत, अमीरे अहले सुन्नत की तहरीर और बयानात ने वोह बहारें दिखाई कि उन की बहनें बुरक़अ पहनने लगीं और दावते इस्लामी के दीनी माहोल से वाबस्ता हो कर ज़िम्मेदार इस्लामी बहनों के साथ सुन्नतों भरे इज्तिमान में शिर्कत करने के साथ साथ दीगर दीनी कामों में भी शामिल रहने लगीं।

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